Why Jerusalem is not considered Israel Capital. येरूशलम राजधानी एक, दावेदार दो.– News18 Hindi

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ट्रंप के येरूशलम को राजधानी मानने क्यों भड़का गुस्सा

येरूशलम, धार्मिक और राजनीतिक वजहों से विवादों में रहा है (Photo – AP)

Kalpana Sharma

Kalpana Sharma

| News18Hindi

Updated: December 7, 2017, 4:43 PM IST

अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने घोषणा की है कि उनका देश येरूशलम को इज़राइल की राजधानी की मान्यता देता है. साथी ही उन्होंने सालों से अटके उस कदम को भी उठाने का फैसला लिया जिसके तहत इज़राइल के तेल अवीव स्थित अमेरिकी दूतावास अब येरूशलम शिफ्ट हो जाएगा. दरअसल 1995 में जब बिल क्लिंटन राष्ट्रपति थे, तब अमेरिकी कांग्रेस ने तेल अवीव से दूतावास को येरूशलम शिफ्ट करने के कानून को पास कर दिया था. यह काम वैसे तो 1999 तक हो जाना चाहिए था. लेकिन इसी कानून के एक प्रावधान के तहत क्लिंटन के बाद आए हर राष्ट्रपति, राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर इस काम को छह महीने आगे टालने के निर्देश देते रहे. खुद ट्रंप ने इस जून में ऐसा ही कुछ किया था. लेकिन ये सवाल अब भी है कि क्या बाकी देश भी ऐसा करेंगे.

यह शहर इतना विवादित स्थान है कि वहां दूतावास का स्थानांतरण करना अशांति को निमंत्रण देना जैसा है. अब ट्रंप ने अमेरिकी चुनाव के दौरान यहूदी वोटरों से किए वादे को निभाने के लिए वह कदम उठाया है. अमेरिका पहला देश है जिसने येरूशलम को इज़राइल की राजधानी की मान्यता दी है. हालांकि अंतरराष्ट्रीय कानून भी विवादों के चलते येरूशलम को राजधानी मानने से बचता आया है.

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Photo : AP



क्यों है येरूशलम को लेकर विवाद दरअसल येरूशलम, खासतौर पर इस शहर का पूर्वी हिस्सा इज़राइल और फलस्तीन के बीच विवाद की अहम जड़ है. बल्कि इस शहर को लेकर इज़राइल का सामना सिर्फ फलस्तीन से ही नहीं, तमाम अरब और मुस्लिम देशों से भी है. पूर्वी येरूशलम पर धार्मिक वजहों से दुनियाभर की नज़र रहती है. यहां यहूदी, इस्लाम और ईसाई धर्म के अहम धार्मिक स्थल हैं. ईसाई मानते हैं कि शहर के इसी हिस्से में ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था. यहीं वह फिर से अवतरित हुए थे. वहीं इस्लाम धर्म में मान्यता है कि यहीं से पैगंबर मोहम्मद ने जन्नत की यात्रा की थी. यहीं पर यहूदियों की पवित्र दीवार भी है. उनके बीच ये मान्यता है कि यहीं से पूरी दुनिया का निर्माण हुआ था. इन धार्मिक वजहों ने ही इस जगह को राजनीतिक दृष्टि से भी दुनिया के केंद्र बिंदू में लाकर रख दिया है.

फलस्तीन भी येरूशलम के पूर्वी हिस्से को अपनी राजधानी मानता है

इस संघर्ष की शुरुआत दूसरे विश्व युद्ध के बाद से हुई, जब यूरोप में खुद पर हो रहे अत्याचारों से पीछा छुटाने के लिए कई यहूदी मध्य पूर्व के फलस्तीन हिस्से में भाग आए. यहूदी यहां अपना एक अलग देश बसाना चाहते थे लेकिन ये पहले से ही अरब और मुस्लिम बाहूल्य इलाका था, इसलिए यहां ज़मीन को लेकर खींचातानी शुरू हो गई, जो अब तक जारी है. 1948 में इज़राइल राष्ट्र का निर्माण हुआ. इस देश ने येरूशलम के पश्चिमी हिस्से में संसद स्थापित की. 1967 में हुए युद्ध में इज़राइल ने पूर्वी येरूशलम पर भी कब्ज़ा कर लिया. उसे अपनी राजधानी घोषित कर दिया. लेकिन फलस्तीन समेत कई मुस्लिम देशों ने इसे मानने से इंकार कर दिया. फलस्तीन इस शहर के पूर्वी हिस्से को भविष्य में बनने वाले अपने राज्य की राजधानी मानता है. इतने संवेदनशील विवाद की वजह से अंतरराष्ट्रीय कानून येरूशलम को इज़राइल की राजधानी की मान्यता नहीं दे रहा.

इसीलिए तेल अवीव में हैं दूतावास 

अंतरराष्ट्रीय मान्यता के नहीं मिलने की वजह से ही अभी तक इज़राइल में जितने भी दूतावास हैं, वह येरूशलम में न होकर इस देश के एक और अहम शहर तेल अवीव में होते आए हैं. ट्रंप के येरूशलम में दूतावास ले जाने के फैसले से दुनियाभर के अरब और मुस्लिम देश नाराज़ हो गए हैं. अमेरिका को हिंसा की चेतावनी भी दी गई है. सिर्फ अरब ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र ने ट्रंप के इस कदम की आलोचना की है, वहीं कहा जा रहा है कि ऐसा करके ट्रंप आग से खेल रहे हैं. फलस्तीनियों ने इज़राइल और अमेरिका के खिलाफ प्रदर्शन शुरू कर दिया है और यह भी कहा है कि इस फैसले को स्वीकार करने का मतलब है मौत को गले लगाना. येरूशलम स्थित इस्लाम के पवित्र स्थल के संरक्षकों में एक जॉर्डन ने कहा है कि राजधानी की मान्यता के इस मामले में ट्रंप को नतीजे भुगतने पड़ सकते हैं. उधर तुर्की की ओर से इस तरह के बयान को शांति वार्ता में खलल की तरह देखा जा रहा है.



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