सुप्रीम कोर्ट में ऐसा क्या हुआ है कि इसके चार जजों को इसे बचाने की अपील करनी पड़ रही है?

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स्वतंत्र भारत और सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में पहली बार शीर्ष अदालत के चार वरिष्ठतम जजों ने मीडिया के सामने आकर पूरे देश से सुप्रीम कोर्ट को बचाने की अपील यह कहते हुए की है कि वे लोकतंत्र को बचाना चाहते हैं. इन न्यायाधीशों की ओर से मीडिया से बात करते हुए जस्टिस चेलामेश्वर का कहना था कि ‘हमारी संस्था (सुप्रीम कोर्ट) और देश के लिए जिम्मेदारी है. सीजेआई (भारत के मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा) को इस संस्था (सुप्रीम कोर्ट) की रक्षा के लिए कदम उठाने के बारे में समझाने की हमारी कोशिशें नाकाम रही हैं.’

जस्टिस जे चेलामेश्वर के मुताबिक बीते कुछ महीनों में ऐसी बहुत सी बातें हुई हैं, जिनकी जरूरत नहीं थी. जब जजों से पूछा गया कि क्या वे मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग की मांग करते हैं तो उन्होंने कहा, ‘इसे देश को तय करने दीजिए.’ उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट में कामकाज ठीक से नहीं चल रहा है, इसलिए उन्हें यह कदम उठाने के लिए मजबूर होना पड़ा है.

लेकिन सुप्रीम कोर्ट में ऐसी कौन सी बातें हुई हैं कि जस्टिस मदन बी लोकुर, कुरियन जोसेफ, रंजन गोगोई और जे चेलामेश्वर जैसे चार इतने वरिष्ठ जजों को इस तरह से मीडिया के सामने आना पड़ा है. इसके जवाब के लिए हमें इन्हीं चार जजों के उस पत्र के कुछ हिस्सों को पढ़ना होगा जो इन्होंने आज से करीब दो महीने पहले देश के मुख्य न्यायाधीश को लिखा था. इस पत्र में इन्होंने लिखा है कि यह न्याय व्यवस्था का एक जाना-माना सिद्धांत है कि सुप्रीम कोर्ट जैसी किसी भी बहुसदस्यीय न्यायिक संस्था का कोई भी सदस्य किसी ऐसे मामले में दखल या फैसला नहीं दे सकता जिसे किसी दूसरी पीठ द्वारा सुना जाना चाहिए. और अगर ऐसा होता है तो इससे न केवल उस संस्था की साख को गहरा धक्का लगेगा बल्कि उससे अराजकता फैल जाएगी.

सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र का अंश
सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्र का अंश

इस पत्र में चारों जजों ने आगे लिखा है कि पिछले कुछ दिनों से इस सिद्दांत की तरफ ध्यान न देते हुए ‘ऐसे कई उदाहरण सामने आये हैं जिनमें देश और संस्था के लिए बेहद दूरगामी परिणामों वाले मामले भी बिना किसी सही कारण के इस अदालत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपनी पसंद की पीठ को सौंप दिये गये.’

इसी पत्र में इन चारों न्यायाधीशों ने कहा है कि मुख्य न्यायाधीश को एक परंपरा के तहत रोस्टर बनाने यानी अलग-अलग जजों को अलग-अलग मामले सौंपने का काम सिर्फ इसलिए दिया गया है ताकि सुप्रीम कोर्ट की व्यवस्था सुचारू रूप से चल सके. इसकी वजह से वे सुप्रीम कोर्ट के बाकी जजों से कोई ज्यादा शक्ति नहीं मिल जाती और वे वहां सिर्फ ‘फर्स्ट अमॉन्ग ईक्वल्स’ ही हैं.

अपने इस पत्र में जजों ने किसी खास मामले का उल्लेख यह कहते हुए नहीं किया है कि वे ऐसा करके सुप्रीम कोर्ट को और शर्मिंदा नहीं करना चाहते हैं. जजों के मुताबिक पिछले कुछ समय से जो हो रहा उससे कोर्ट की छवि को पहले ही काफी धक्का लग चुका है.

कानून के जानकारों का मानना है कि जस्टिस चेलामेश्वर सहित चार जजों ने जिन मामलों का जिक्र अपने पत्र में नहीं किया है उनमें से सबसे महत्वपूर्ण मेडीकल काउंसिल ऑफ इंडिया वाला मामला है. इस मामले में एक मेडिकल कॉलेज में दाखिलों पर लगी रोक हटवाने के लिए जजों को घूस देने के प्रकरण में देश के मुख्य न्यायाधीश पर भी गंभीर आरोप लगे थे.

चूंकि मेडिकल कॉलेज घूसखोरी मामले की सुनवाई पहले उनकी पीठ में हो चुकी थी लिहाजा कानून के कई जानकारों का मानना है कि जब वही पीठ घूस को लेकर सवालों के घेरे में आ गई तो उन्हें इस मामले में किसी भी तरह का हस्तक्षेप करने के बजाय इससे पूरी तरह से अलग हो जाना चाहिए था. लेकिन जब जस्टिस चेलामेश्वर ने घूस वाले मामले की सुनवाई के लिए पांच वरिष्ठतम जजों की एक पीठ का गठन किया तो जस्टिस मिश्रा ने इसे गलत करार देते हुए बेहद हड़बड़ी में एक नई पीठ का गठन कर दिया. इसमें न केवल लगभग सभी वरिष्ठ न्यायाधीशों की अनदेखी की गई थी बल्कि ऐसे न्यायाधीशों को भी जगह दी गई जो मेडिकल कॉलेज घूसखोरी मामले की सुनवाई करने वाली विवादित पीठ में भी थे.

कानून के कई जानकारों का भी चारों जजों की तरह ही मानना था कि जस्टिस दीपक मिश्रा ने इस मामले में जो किया वह न्याय के उस मौलिक सिद्धांत के खिलाफ था कि अपने ही मामले में कोई न्यायाधीश नहीं हो सकता. इसलिए जस्टिस मिश्रा को मेडिकल कॉलेज घूसखोरी मामले में किसी भी तरह के हस्तक्षेप से बचना चाहिए था.



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