यूपी में कांटे की टक्कर वाली ये सीटें हैं सभी पार्टियों के लिए बड़ी चुनौती

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यूपी की 403 में से 23 ऐसी विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जिनमें हार-जीत का अंतर एक हजार वोट से भी कम था, जबकि दस सीटों पर तो 500 वोट से ही हार-जीत का फैसला हुआ था. अब ऐसी सीटों पर पार्टियों का फोकस सबसे ज्‍यादा है. उत्तर प्रदेश में करीब 41 सीटें ऐसी हैं, जहां महज कुछ वोटों ने प्रत्याशी की जीत को हार में तब्दील कर दिया. ये वो सीटें हैं, जहां का जीत प्रतिशत एक से भी कम है. इस बार यूपी में मुकाबला त्रिकोणीय है. इसलिए एक-एक सीट पार्टियों के लिए महत्‍वपूर्ण है. विशेषज्ञों का कहना है कि कांटे की टक्‍कर वाली सीटों पर वोट कटवा पार्टियां सबसे ज्‍यादा खतरनाक साबित होती हैं. बड़े दलों को इन्‍हें रोकना बड़ी चुनौती है.

कम अंतर से जीत-हार तय करने वाली सीटों से समीकरण बदल और बिगड़ सकते हैं. बहुत कम अंतर से सबसे ज्‍यादा 9 सीटें बीएसपी के हाथ से छूट गई थी, जबकि दूसरे नंबर पर बीजेपी थी, जिसे पांच सीटें गंवानी पड़ी थीं. सपा ऐसी चार सीटें चूक गई थी. इसी प्रकार एक हजार से पांच हजार वोटों से जीत-हार तय करने वाली 60 से अधिक सीटें थीं. इन पर भी पार्टियों का फोकस है.

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सेंटर फॉर द स्‍टडी ऑफ सोसायटी एंड पॉलिटिक्‍स के निदेशक प्रोफेसर एके वर्मा कहते हैं कि चुनाव में हर एक सीट महत्‍वपूर्ण होती है. लेकिन जिन 40-50 सीटों पर बहुत कम अंतर से कोई भी जीतता-हारता है, उन पर वह अगले चुनाव में काफी जोर देता है। ऐसी सीटें समीकरण बनाने, बिगाड़ने के लिए महत्‍वपूर्ण हैं. बीजेपी  2012 के चुनाव में यहां पर सिर्फ 47 सीट पर थी, लेकिन अब उसने 265 प्‍लस का लक्ष्‍य रखा है. इसी तरह कांग्रेस और सपा गठबंधन कर रहे हैं ताकि उनका वोट एकत्र होकर ज्‍यादा सीटों में बदल जाए.जाहिर सी बात है कि हर एक सीट पर करो या मरो वाली स्‍थिति है, लेकिन इन दलों को ऐसी सीटों पर यही दुआ करनी होगी कि छोटी पार्टियां और निर्दलीय कम से कम खड़े हों. क्‍योंकि यह सिर्फ वोट कटवा साबित होते हैं. लेकिन कई बड़ी पार्टियों का खेल अपने हजार-पांच सौ वोटों से खराब कर देते हैं. भाजपा, सपा, बसपा और कांग्रेस जैसी पार्टियों के लिए ये वोट कटवा बहुत खतरनाक हैं.

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ये हैं बड़े उदाहरण

  • बरेली की बेहड़ी सीट बीजेपी के प्रत्‍याशी छत्रपाल सिंह समाजवादी पार्टी के अतउर्रहमान से सिर्फ 18 वोटो के अंतर पर हार गए थे.
  • सिकंदराबाद से बीएसपी प्रत्‍याशी सलीम अख्‍तर खान बीजेपी की विमला सिंह सोलंकी से सिर्फ 123 वोट से हार गए थे.
  • ऐसी ही सीटों में फर्रुखाबाद भी शामिल है. यहां बीजेपी के मेजर सुनील दत्‍त द्विवेदी निर्दलीय विजय सिंह से महज 147 वोटों से हार गए थे.
  • पट्टी सीट से बीजेपी के राजेंद्र प्रताप सिंह समाजवादी पार्टी के राम सिंह से 156 वोटों से हार गए थे.
  • बालामऊ में भी बहुत कम वोटों से ही जीत-हार तय हुई थी. यहां बीएसपी के रामपाल वर्मा को समाजवादी पार्टी के अनिल वर्मा से महज 173 वोटों से हार माननी पड़ी थी.

ऐसे खराब हुआ सियासी खेल

सिर्फ तीन फीसदी वोट इधर से उधर होने पर उत्तर प्रदेश में करीब 150 सीटें बसपा की 2012 में कम हो गई थीं. पूर्ण बहुमत के साथ अखिलेश यादव की ताजपोशी हो गई थी. वर्ष 2002 में भी मायावती को मुलायम से महज कुछ कम प्रतिशत वोट हासिल करने की कीमत सत्ता से दूर रहकर चुकानी पड़ी थी. इस कड़ी टक्कर का असर मुलायम ने भी उस समय झेला, जब​ 2007 में उनकी पार्टी ने बसपा से कुछ ही प्रतिशत कम वोट हासिल किए लेकिन वह 100 सीटों का आंकड़ा भी हासिल नहीं कर सके.

41 सीटें ऐसी जहां चंद वोटों ने बदल दी प्रत्याशी की तकदीर

उत्तर प्रदेश में करीब 41 सीटें ऐसी हैं, जहां महज कुछ वोटों ने प्रत्याशी की जीत को हार में तब्दील कर दिया. ये वो सीटें हैं, जहां का जीत प्रतिशत एक से भी कम है. इनमें बहेड़ी, सिकंदराबाद, फर्रुखाबाद, पट्टी, बालामऊ, गाजीपुर, थाना भवन, महोबा, बेहट, करछना, मथुरा, जलालाबाद, गौरीगंज, इलाहाबाद, बिठूर, कोइल, धामपुर, फतेहाबाद, घाटमपुर, बैरिया, कटरा, मेजा, धौरहरा, रुदौली, सिंकदरा, फूलपुर, उतरौला, जौनपुर, महरोनी, अकबरपुर रनिया, बबेरू, चायल, मधुबन, कांठ, स्याना, मिश्रिख, बिलारी, बख्शी का तालाब, डुमरियागंज, फिरोजाबाद, बीकापुर सीटें शामिल हैं.

(साथ में लखनऊ से अजयेंद्र रंजन)



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