जब नरेंद्र मोदी जानते हैं कि भाजपा दो-फाड़ हो रही है तो वे इसके लिए कुछ करते क्यों नहीं हैं?

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नरेंद्र मोदी अपनी पार्टी के सुप्रीम लीडर हैं, लेकिन उनकी नाक के नीचे पूरी पार्टी धीरे-धीरे दो-फाड़ होती जा रही है. मोदी इसके बारे में जानते हैं लेकिन फिर भी इसे होने दे रहे हैं.

सुनी-सुनाई है कि पिछले छह महीने में भाजपा में नेताओं के बीच जबरदस्त ध्रुवीकरण हुआ है. एक-एक कर ज्यादातर बड़े नेता इसका हिस्सा बनते जा रहे हैं. इस वक्त पार्टी में ऐसे गिने-चुने नेता ही हैं जो दो गुटों में से किसी में भी शामिल नहीं हैं. भाजपा की खबर रखने वाले कुछ पत्रकारों और फिर कुछ भाजपा नेताओं से बात करने पर सब समझ में आ जाता है.

इस वक्त भाजपा के एक गुट के नेता हैं भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और दूसरे गुट के नेता हैं वित्त मंत्री अरुण जेटली. शाह का दबदबा पार्टी में है और जेटली का सरकार में. इस वक्त केंद्र सरकार के ज्यादातर ताकतवर मंत्री ‘जेटली क्लब’ के मेंबर बताए जाते हैं और ज्यादातर मुख्यमंत्रियों को अमित शाह का खासमखास कहा जाता है.

सबसे पहले केंद्र सरकार की बात करें तो रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण, रेल मंत्री पीयूष गोयल, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, प्रधानमंत्री कार्यालय में मंत्री डॉक्टर जीतेंद्र सिंह, शहरी विकास मंत्री हरदीप सिंह पुरी, पर्यटन मंत्री अल्फोंस कन्नथनम, बिजली मंत्री आरके सिंह और खेल मंत्री राज्यवर्धन सिंह राठौड़ जेटली के खेमे के बताए जाते हैं. दूसरी तरफ सूचना प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी, स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद अमित शाह के करीबी माने जाते हैं. गृह मंत्री राजनाथ सिंह और विदेश मंत्री सुषमा स्वराज खुद को दोनों ही गुट से अलग रखते हैं. सड़क परिवहन और जल संसाधन मंत्री नितिन गडकरी भी भी किसी गुट के बजाय संघ के करीबी हैं.

धीरे-धीरे भाजपा के मुख्यमंत्रियों में भी गोलबंदी शुरू हो चुकी है. गुजरात के मुख्यमंत्री विजय रुपाणी अमित शाह के अपने हैं. हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने भी शाह को अपना रक्षक बना लिया है क्योंकि जितनी बार खट्टर की कुर्सी खतरे में पड़ी अमित शाह ने ही उनका बचाव किया. राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने पहले अमित शाह के साथ बातचीत बढ़ाई थी लेकिन अब वे जेटली के ज्यादा करीब बताई जाती हैं. महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस पहले अमित शाह की ही पसंद थे, लेकिन अब वे नरेंद्र मोदी के बेहद करीब हैं और पिछले दिनों शाह से ज्यादा उनकी नजदीकी जेटली से हो गई है.

बिहार एक ऐसा राज्य है जहां के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी दोनों ही अरुण जेटली के करीबी हैं. लेकिन सबसे ज्यादा मुश्किल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की है. वे अमित शाह से भी थोड़ा दूर हैं और अरुण जेटली से भी. और कभी-कभी उन्हें इसका नुकसान भी उठाना पड़ता है. लखनऊ की जानकारी रखने वालों के मुताबिक अपनी छोटी-छोटी बात मनवाने के लिए भी योगी को खुद प्रधानमंत्री से बात करनी पड़ती है. इसके उलट बाकी राज्यों के मुख्यमंत्री अमित शाह और अरुण जेटली के जरिए भी दिल्ली में अपना काम आसान कर लेते हैं.

गोवा के मुख्यमंत्री मनोहर पर्रिकर भी पहले नरेंद्र मोदी के ही करीब थे, लेकिन अब वे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के साथ-साथ अमित शाह के भी नजदीक हो गए हैं. उत्तराखंड और हिमाचल के मुख्यमंत्री भी अमित शाह के ही गुट के हैं क्योंकि इन दोनों को कुर्सी पर बिठाने में शाह की ही बड़ी भूमिका रही है. उधर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान बड़ी पशोपेश में हैं. पहले वे आडवाणी के खेमे में थे, इसके बाद वे नरेंद्र मोदी गुट में आने की कोशिश करते दिखे और अब तय नहीं कर पा रहे हैं कि अमित शाह के साथ जाएं या फिर जेटली के साथ. उनके लिए ज्यादा समय तक असमंजस की हालात में रहना ठीक नहीं होगा क्योंकि जल्द ही उनके राज्य में भी चुनाव होने वाले हैं.

अब सवाल यह उठता है कि जब नरेंद्र मोदी जानते हैं कि उनकी पार्टी दो गुटों में बंटती जा रही है तो फिर वे इसके लिए कुछ करते क्यों नहीं हैं? मोदी के करीब रहे नेता बताते हैं कि गुजरात में भी उनके काम करने का तरीका यही था. वे कभी भी एक ही नेता को सर्वशक्तिमान नहीं बनाना चाहते. जब वे गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी गांधीनगर में आनंदी बेन पटेल और अमित शाह का गुट चलता था. इन दोनों गुटों के काम बंटे हुए थे और दोनों को एक-दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करने की मनाही थी. जब भी कोई मामला बढ़ता था तो उसे मोदी ही सुलझाते थे. पत्रकारों की भाषा में कहें तो इसे ‘बैलेंसिंग एक्ट’ कहा जाता है, यानी शक्ति का संतुलन.

भाजपा की खबर रखने वाले कुछ सूत्र बताते हैं कि जब लगातार जीत मिलने की वजह से अमित शाह की ताकत बढ़ने लगी थी तो मोदी ने उनके कुछ लोगों के पर कतर दिए जेटली के कुछ करीबियों को मंत्री बना दिया. अगर आने वाले समय में जेटली की ताकत बहुत ज्यादा हो जाती है तो फिर अमित शाह के करीबियों को पद और प्रतिष्ठा मिलने लगेंगे.

लेकिन कुछ पुराने पत्रकारों की बात भी गौर करने वाली है. उनका कहना है कि जब भाजपा के नेता आपस में लड़ते हैं तो तरह-तरह की सही-गलत खबरें प्लांट करना शुरू कर देते हैं जिससे अंत में नुकसान होता पार्टी का ही है. जो अंदर की बात जानते हैं वे समझ गए होंगे कि ऐसा होना तो शुरू हो ही गया है.



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