क्यों कांग्रेस के ये फैसले मानव संसाधनों के मामले में उसके खराब प्रबंधन की चुगली करते हैं

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बीते दिनों कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने कुछ राज्यों के लिए नए पार्टी प्रभारियों की नियुक्ति की. पहले पार्टी के जिन वरिष्ठ नेताओं के पास इन राज्यों के प्रभार थे, उनसे यह जिम्मेदारी वापस लेकर राहुल गांधी ने पार्टी में इसे अपेक्षाकृत युवा माने जाने वाले नेताओं को दिया है. लेकिन इन नियुक्तियों को लेकर कई तरह के सवाल इनकी घोषणा के तुरंत बाद ही उठने लगे हैं. राहुल गांधी को उम्मीद थी कि इन नियुक्तियों से पार्टी कार्यकर्ताओं में नया उत्साह आएगा और प्रदेश स्तर पर कांग्रेस संगठन को मजबूती मिलेगी. लेकिन इन नियुक्तियों को लेकर पार्टी के अंदर और बाहर जिस तरह की बातें चल रही हैं, उन्हें देखते हुए राहुल गांधी की ये उम्मीद पूरी होती नहीं दिख रही.

सबसे अधिक सवाल गुजरात कांग्रेस प्रभारी के तौर पर राजीव सतव की नियुक्ति पर उठ रहे हैं. सतव पार्टी के वरिष्ठ नेता और राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की जगह लेंगे. सतव युवा कांग्रेस के अध्यक्ष रहे हैं. कांग्रेस के युवा नेताओं में जो लोग संघर्ष करके आगे बढ़े हैं, उनमें उनका नाम प्रमुखता से लिया जाता है. वे महाराष्ट्र युवा कांग्रेस के भी अध्यक्ष रहे हैं. अभी वे महाराष्ट्र की हिंगोली सीट से लोकसभा सांसद हैं. कांग्रेस में यह माना जाता है कि राहुल गांधी को जो नए नेता प्रिय हैं, उनमें राजीव सतव एक हैं.

लेकिन गुजरात प्रभारी के तौर पर उनकी नियुक्ति को लेकर पहले दिन से सवाल उठने लगे हैं. जिस दिन उनकी नियुक्ति की घोषणा हुई, उसी दिन से भारतीय जनता पार्टी की गुजरात इकाई ने उन्हें और उनके बहाने कांग्रेस को घेरने की शुरुआत कर दी. भाजपा प्रदेश प्रवक्ता भरत पंड्या ने राजीव सतव के उस पुराने पत्र को सार्वजनिक कर दिया जिसमें सतव ने नर्मदा बांध का विरोध किया था. इस आधार पर भाजपा यह कह रही है कि राहुल गांधी ने गुजरात कांग्रेस का काम उस व्यक्ति को सौंपा है जो गुजरात के विकास के लिए अहम माने जाने वाली परियोजना का विरोध करता आया है. इस आधार पर भाजपा राहुल गांधी के निर्णय को गुजरात विरोधी ठहराने की कोशिश कर रही है.

राहुल गांधी ने गुजरात के शक्ति सिंह गोहिल को बिहार का प्रभारी बनाया है. वे पार्टी के वरिष्ठ नेता सीपी जोशी की जगह लेंगे. गोहिल को गुजरात कांग्रेस का एक प्रमुख चेहरा माना जाता है. वे कई बार विधायक रहे हैं. बताया जा रहा है कि राहुल गांधी के इस निर्णय से खुद शक्ति सिंह गोहिल बहुत खुश नहीं हैं. इसकी वजह यह बताई जा रही है कि गोहिल दिल के मरीज हैं और बहुत अधिक यात्रा करने से बचते हैं. लेकिन अगले लोकसभा चुनावों के लिहाज से बिहार में कांग्रेस की संभावनाओं के महत्व को देखते हुए उन्हें कई बार बिहार का दौरा करना पड़ेगा.

उत्तराखंड के प्रभारी के तौर पर अनुग्रह नारायण सिंह की नियुक्ति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं. जिस दिन उनकी नियुक्ति की घोषणा हुई उस दिन तक कई पार्टी नेताओं को ही नहीं मालूम था कि अनुग्रह नारायण सिंह कौन हैं. अब तक उत्तराखंड कांग्रेस प्रभारी के तौर पर वरिष्ठ नेता अंबिका सोनी काम कर रही थीं. अनुग्रह नारायण सिंह उत्तर प्रदेश के हैं और चार बार विधायक रहे हैं. अभी भी वे इलाहाबाद की एक सीट से विधायक हैं. लेकिन न तो उत्तर प्रदेश में उनकी कोई राज्यव्यापी पहचान है और न ही राष्ट्रीय राजनीति में वे खासे सक्रिय रहे हैं.

पिछले साल उत्तराखंड में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हुई है. ऐसे में कांग्रेस की स्थिति मजबूत करने के लिए प्रदेश स्तर के नेता इस उम्मीद में थे कि इस प्रदेश का प्रभार राहुल गांधी किसी वरिष्ठ नेता को सौंपेंगे. लेकिन ऐसा नहीं हो पाया.

इन नियुक्तियों को देखते हुए राजनीतिक विश्लेषकों को यह लग रहा है कि कहां तो राहुल गांधी को कांग्रेस संगठन में नई जान फूंकने की दिशा में बढ़ना चाहिए था और कहां वे इस तरह की नियुक्तियां करके खराब मानव संसाधन प्रबंधन का उदाहरण दे रहे हैं. कई जानकारों को यह भी लगता है कि अगर इन नियुक्तियों में राहुल गांधी ने राजनीतिक सूझबूझ नहीं दिखाई तो पार्टी संगठन को नए सिरे से खड़ा करने का काम उनके लिए और मुश्किल हो जाएगा.

राज्यों के प्रभारी की नियुक्ति इसलिए भी बेहद अहम मानी जाती है क्योंकि प्रदेश संगठन और राष्ट्रीय नेतृत्व के बीच की सबसे प्रमुख कड़ी प्रदेश प्रभारी ही होता है. प्रदेश संगठन की क्या जरूरतें हैं, यह केंद्रीय नेतृत्व तक पहुंचाने का काम और केंद्रीय नेतृत्व को प्रदेश संगठन से क्या उम्मीदें हैं, यह प्रदेश स्तर पर पहुंचाने का काम प्रदेश प्रभारी का ही है. विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा टिकटों के बंटवारे से लेकर प्रदेश पदाधिकारियों की नियुक्ति तक में प्रदेश प्रभारी की एक अहम भूमिका हो जाती है.

इसलिए अगर प्रदेश प्रभारी नियुक्त करने के मामले में किसी पार्टी से चूक होती है तो उसके बाद कई दूसरी गलतियां स्वाभाविक ही हैं. इन नियुक्तियों में हुई गलतियों और इसके राजनीतिक दुष्परिणामों को कम करने के लिए कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी क्या करेंगे, यह अभी देखा जाना है.



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