इस धर्म में संगीत और नृत्‍य से मिलते हैं खुदा, हैरान कर देगी साधना पद्धति..!

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सूफीमत से हर कोई परिचित है, लेकिन अधिकांश लोगों को इसके मर्म, उद्देश्य और सबसे महत्त्वपूर्ण और चैतन्य बोध प्राप्ति आदि का सम्भ्वतः पूर्ण ज्ञान न हो। सूफीमत में देखा जाए तो इस्लाम से इतर उसमें बौद्ध, इसाईमत, हिन्दुत्व, ईरानी, जर्थुस्त्रवाद के अंशों का सम्मिलन है। इस्लाम ने संगीत को और गाजे-बाजे आदि को कभी महत्त्व नहीं दिया, परन्तु सूफी संतों ने उसे ही चैतन्य बोध का आधार बनाया, इसलिए कट्टरवादियों की नजरों में सूफी काफिर भी बन गए।

गहरे डूबना ही उद्देश्य : सूफी मत में कर्मकाण्ड के स्थान पर दिल के हाल पर विशेष बल दिया गया है। उनका बस एक ही आग्रह है, जो भी करना है वह पूरे दिल से करना है। नमाज़ पढ़नी है, तो वह पूरे दिल से पढ़ो। वजू करना है तो वह पूरे दिल से करो और उसमें इतना गहरा पैठ जाओ कि शरीर ही नहीं बल्कि समस्त ब्रह्माण्ड अच्छे से साफ और पाक हो जाए। संगीत में जाना है, तो उसमें पूरी तरह से सबकुछ भूलकर बस भक्ति भाव में डूब जाओ।

भारतवर्ष में व्यापक प्रचार-प्रसार : सूफीमत का भारतवर्ष में देखा जाए तो व्यापक प्रचार हुआ। यहां कुल चार सूफी सम्प्रदाय प्रसिद्ध हुए। बंगाल का सुहरावर्दी सम्प्रदाय, जिसके प्रवर्तक हज़रत जियाउद्दीन थे। अजमेर का चिश्तिया सम्प्रदाय, जिसके प्रर्वतक हज़रत अदब अब्दुल्ला चिश्ती थे। इसमें निजामुद्दीन औलिया, मलिक मौहम्मद, अमीर खुसरू आदि विश्व प्रसिद्ध संत हुए। तीसरा शेख अब्दुल क़ादिर जीलानी का कादिरिया और चौथा था, नक्शवंदील जिसके प्रर्वतक ख्वाज़ा बहाउद्दीन नक्शबंदी थे। बिहार के सुप्रसिद्ध महदूम शाह इसी सम्प्रदाय के थे।

सूफी बन्धनों से सर्वथा अलग-थलग : सूफी मतावलंबी दिखावे, तड़क-भड़क और ऐश्वर्य भय जीवन से दूर सादा जीवन और उच्च विचार पर बल देते थे और सबसे महत्त्वपूर्ण जो उनमें चलन में रहा वह था, धार्मिक तथा नैतिक बंधनों से सर्वथा मुक्त रहना। नमाज़, रोजा, हज, ज़कात, ज़िहाद आदि से तो उन सब सूफी संतो का कभी कोई लेना-देना नहीं रहा।

हर दम में रूहानी मस्ती : सूफी मत में संगीत की धुन पर मस्ती से नाचना बहुत अधिक प्रचलित है। सूफी गायकी में अनेक प्रसिद्ध गायकों ने सूफी गीतों को जीवन्त कर दिया। उनके बोल, उनकी धुन, संगीत और मदमस्ती भरी गायकी सब ऐसा है कि सूफीमत से सर्वथा अंजान व्यक्ति भी एक बार को सुनकर मस्ती में झूमने लगे। सूफीआना गीतों में क़व्वालीनुमा भजन ‘दमादम मस्त कलन्दर’ शायद ही कोई ऐसा संगीत प्रेमी होगा जिसने न सुना हो। इस अमर गीत के महानायक सुहारवर्दी सम्प्रदाय के हज़रत सखी लाल शाहबाज कलन्दर थे।

सखी संत का वास्तविक नाम हज़रत सैयद उस्मान था। वह सुर्खलाल रंग का चोला पहनते थे, इसलिए वह लाल कलन्दर कहलाने लगे। यह गीत वस्तुतः सिंघ प्रान्त के हिन्दु संत श्री झूलेलाल का एक भजन था, जो पूरे भारतीय उपमहाद्वीपों में अत्यन्त लोकप्रिय हुआ। संत झूलेलाल को सम्बोधित करके उनके सामने मां की फरियाद की गई है इस कव्वालीनुमा भजन में। यह प्रसिद्ध गीत पंजाबी और सिंधि मिश्रित भाषा में है। अनेकों सूफी गायकों ने इस भजन को अपनी आवाज़ देकर मस्ती में लाखों लोगों को झुमाया है। इस अमर-गीत ‘दमादम मस्त कलन्दर’ का अर्थ है – हर सांस (दम) में मस्ती रखने वाला फ़क़ीर (कलन्दर) !

Khwaja-Mere-Khwaja

चैतन्य बोध के लिए रूहानी सूफी नृत्य : सूफी संत-फकीर अथवा कलन्दर चैतन्य बोध के लिए एक विशेष प्रकार का नृत्य करते हैं। इनका एक नाम सूफी दरवेश नृत्य भी है। शान्त, मध्यम और संगीतपूर्ण लयबद्धता में सूफी एक स्थान पर एन्टिक्लॉक वाइज़ मस्ती में घूमते हैं। घूमने की गति मस्ती के साथ बढ़ती जाती है और अपनी-अपनी सामर्थ्य और शक्ति की अनुसार एक लट्टू की तरह घूमने लगती है। अध्यात्म-रूहानियत में रमने के बाद एक ऐसी अवस्था भी आ जाती है, जब अर्ध्य विक्षप्त सा भक्त, संत ज्ञानी, सूफी, दरवेश, फकीर आदि मस्ती में झूमने लगता है, नाचने लगता है, अपने तन-मन की सुध खोकर।

ईश प्रेम में लगभग पागल सा हो जाता है। इस अवस्था में उसका मन एक दम से निर्मल हो जाता है। मीरा, चैतन्य कृष्ण की रास लीला आदि इसके प्रमाण हैं। एक अन्य मार्ग भी है रूहानियत की इस भ्रामक और प्रचलित अवस्था को पाने का जिसमें लोग रमें हुए हैं। चरस, गांजा, भांग, शराब आदि मादक द्रव्यों में लिप्त होकर अपने को ‘खोना’ अब यह वाला खोना कौन वाला ‘खोना’ है, इसमें कोई तर्क -कुतर्क नहीं। अपनी-अपनी बुद्धि और विवेक से स्वयं अच्छे-बुरे का मनन कर लें। हां, वास्तव में यदि रमना है तब आप भी रमें इस रूहानी दुनिया के सूफी नृत्य में। परन्तु सर्वप्रथम यह अवश्य संकल्प ले लें कि विकृत मानसिकता और तामसिक खान-पान के माध्यम से कृपया इस मार्ग में जाने की न सोचें।

आइए चलें रूहानी दुनिया में : एक शान्त सा स्थान चुन लें। कोई भी ढीले-ढाले आरामदायक वस्त्र अवश्य धारण कर लें। मन पसंद सूफी संगीत की धुन-गीत बहुत ही मध्यम ध्वनि में बजा लें। एक स्थान पर स्थिर खड़े होकर अर्धखुली आंखों के साथ दाएं हाथ को कंधे के बराबर ऊंचा उठा लें और आकाश के समानान्तर हथेली खोल लें।

बाएं हाथ को सामान्य स्थिति में लटका रहने दें। उसकी हथेली खोल कर धरती के समानान्तर फैला लें। इस मुद्रा में ही अपने स्थान पर खड़े हुए एन्टी क्लॉकवाइज़ घूमना शुरू करें। संगीत की धुन के साथ अपने घूमने की गति भी धीरे-धीरे बढ़ाते जाएं। किसी शारीरिक कमी के कारण घूमना कष्टकारी हो तो बलात् कदापि् न घूमें। हां, अपने स्थान पर इस मुद्रा में अपनी क्षमतानुसार धीरे-धीरे घूम सकते हैं, ताकि शरीर पर अतिरिक्त भार न पड़े। गति में तीव्रता के साथ गर्दन एक ओर को सुखद स्थिति में लटकती हो तो उसको लटका लें। कोई भाव, विचार मन में न आने दें। मस्त-मस्ती में संगीत की धुन पर मस्त होकर नाचते रहें…. और बस नाचते रहें।

घूमते-घूमते चारों तरफ की वस्तुएं अदृष्ट होने लगेंगी। सब कुछ अनदेखा कर इस चारों तरफ उत्पन्न हो रही अदृष्टता को बढ़ाते जाएं और संगीत की धुन के साथ घूमने में रमते जाएं, खोते जाएं, तल्लीन होते जाएं। जब तक थककर चूर न हो जाएं, शरीर थक कर निढाल न हो जाए तब तक सब कुछ भूलकर बस केवल रमने का ध्यान रखें।

गिरने को होने लगें तो हल्के से शरीर को धरती पर छोड़़ दें। पेट के बल धरती पर लेट जाएं। शरीर में कहीं भी तनाव न रह जाए। नाभि और धरती का स्पर्श अनुभव करके भावना जगाएं कि दोनों धीरे-धीरे एक ही हो रहे हैं और एक ऐसी अवस्था आ गई है कि एक ही हो गए हैं। यह एक होना ही दिव्यता से मिलन की सीढ़ी है जो अभ्यास के साथ-साथ आपको एक रूहानी दुनिया में ले जाएगी।

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